उस रसका आस्वादन करते समय प्रेमी श्रोताओंकी दृष्टिमें सब ओर भगवान्की सच्चिदानन्दमयी लीला प्रकाशित हो गयी और सर्वत्र श्रीकृष्णचन्द्रका साक्षात्कार होने लगा॥ ६८॥
तस्मिन्नास्वाद्यमाने तु सच्चिदानन्दरूपिणी।
प्रचकाशे हरेर्लीला सर्वतः कृष्ण एव च॥ ६८
उस रसका आस्वादन करते समय प्रेमी श्रोताओंकी दृष्टिमें सब ओर भगवान्की सच्चिदानन्दमयी लीला प्रकाशित हो गयी और सर्वत्र श्रीकृष्णचन्द्रका साक्षात्कार होने लगा॥ ६८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण POST.3.68 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 1001) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/skanda/3/68/