श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक POST.3.69

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (स्कन्दपुराण) · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

आत्मानं च तदन्तःस्थं सर्वेऽपि ददृशुस्तदा।

वज्रस्तु दक्षिणे दृष्ट्वा कृष्णपादसरोरुहे॥ ६९

ātmānaṃ ca tadantaḥsthaṃ sarve'pi dadṛśustadā|

vajrastu dakṣiṇe dṛṣṭvā kṛṣṇapādasaroruhe|| 69

अर्थ

उस समय सभी श्रोताओंने अपनेको भगवान्‌के स्वरूपमें स्थित देखा। वज्रनाभने श्रीकृष्णके दाहिने चरणकमलमें अपनेको स्थित देखा और श्रीकृष्णके विरहशोकसे मुक्त होकर उस स्थानपर अत्यन्त सुशोभित होने लगे। वज्रनाभकी वे रोहिणी आदि माताएँ भी रासकी रजनीमें प्रकाशित होनेवाले श्रीकृष्णरूपी चन्द्रमाके विग्रहमें अपनेको कला और प्रभाके रूपमें स्थित देख बहुत ही विस्मित हुईं तथा अपने प्राणप्यारेकी विरह-वेदनासे छुटकारा पाकर उनके परमधाममें प्रविष्ट हो गयीं॥ ६९-७१॥

यह अर्थ श्लोक 69–71 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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