श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक POST.4.21

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (स्कन्दपुराण) · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

यः स्थित्वाभिमुखं प्रणम्य विधिवत्त्यक्तान्यवादो हरे-

र्लीलाः श्रोतुमभीप्सतेऽतिनिपुणो नम्रोऽथ क्लृप्तांजलिः।

शिष्यो विश्‍वसितोऽनुचिन्तनपरः प्रश्‍नेऽनुरक्तः शुचि-

र्नित्यं कृष्णजनप्रियो निगदितः श्रोता स वै वक्तृभिः॥ २१

yaḥ sthitvābhimukhaṃ praṇamya vidhivattyaktānyavādo hare-

rlīlāḥ śrotumabhīpsate'tinipuṇo namro'tha klṛptāṃjaliḥ|

śiṣyo viśvasito'nucintanaparaḥ praśne'nuraktaḥ śuci-

rnityaṃ kṛṣṇajanapriyo nigaditaḥ śrotā sa vai vaktṛbhiḥ|| 21

अर्थ

जो वक्ताके सामने उन्हें विधिवत् प्रणाम करके बैठे और अन्य संसारी बातोंको छोड़कर केवल श्रीभगवान्‌की लीला-कथाओंको ही सुननेकी इच्छा रखे, समझनेमें अत्यन्त कुशल हो, नम्र हो, हाथ जोड़े रहे, शिष्यभावसे उपदेश ग्रहण करे और भीतर श्रद्धा तथा विश्‍वास रखे; इसके सिवा, जो कुछ सुने उसका बराबर चिन्तन करता रहे, जो बात समझमें न आये, पूछे और पवित्र भावसे रहे तथा श्रीकृष्णके भक्तोंपर सदा ही प्रेम रखता हो—ऐसे ही श्रोताको वक्ता लोग उत्तम श्रोता कहते हैं॥ २१॥

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