श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक POST.4.26

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (स्कन्दपुराण) · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

मासेन ऋतुना वापि श्रवणं स्वादसंयुतम्।

सात्त्विकं यदनायासं समस्तानन्दवर्धनम्॥ २६

māsena ṛtunā vāpi śravaṇaṃ svādasaṃyutam|

sāttvikaṃ yadanāyāsaṃ samastānandavardhanam|| 26

अर्थ

एक या दो महीनेमें धीरे-धीरे कथाके रसका आस्वादन करते हुए बिना परिश्रमके जो श्रवण होता है, वह पूर्ण आनन्दको बढ़ानेवाला ‘सात्त्विक’ सेवन कहलाता है॥ २६॥

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