श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक POST.4.28

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (स्कन्दपुराण) · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

वर्षमासदिनानां तु विमुच्य नियमाग्रहम्।

सर्वदा प्रेमभक्त्यैव सेवनं निर्गुणं मतम्॥ २८

varṣamāsadinānāṃ tu vimucya niyamāgraham|

sarvadā premabhaktyaiva sevanaṃ nirguṇaṃ matam|| 28

अर्थ

जब वर्ष, महीना और दिनोंके नियमका आग्रह छोड़कर सदा ही प्रेम और भक्तिके साथ श्रवण किया जाय, तब वह सेवन ‘निर्गुण’ माना गया है॥ २८॥

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