सकाम पुरुषको कथाकी समाप्तिके दिनतक स्वयं सावधानीके साथ सभी विधियोंका पालन करना चाहिये। (भागवत-कथाके श्रोता और वक्ता दोनोंके ही पालन करनेयोग्य विधि यह है—) प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान करके अपना नित्यकर्म पूरा कर ले। फिर भगवान्का चरणामृत पीकर पूजाके सामानसे श्रीमद्भागवतकी पुस्तक और गुरुदेव (व्यास) का पूजन करे। इसके पश्चात् अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक श्रीमद्भागवतकी कथा स्वयं कहे अथवा सुने॥ ४२-४३॥✎ 1793
यह अर्थ श्लोक 42–43 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
पुस्तकं च गुरुं चैव पूजयित्वोपचारतः।
ब्रूयाद् वा शृणुयाद् वापि श्रीमद्भागवतं मुदा॥ ४३
सकाम पुरुषको कथाकी समाप्तिके दिनतक स्वयं सावधानीके साथ सभी विधियोंका पालन करना चाहिये। (भागवत-कथाके श्रोता और वक्ता दोनोंके ही पालन करनेयोग्य विधि यह है—) प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान करके अपना नित्यकर्म पूरा कर ले। फिर भगवान्का चरणामृत पीकर पूजाके सामानसे श्रीमद्भागवतकी पुस्तक और गुरुदेव (व्यास) का पूजन करे। इसके पश्चात् अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक श्रीमद्भागवतकी कथा स्वयं कहे अथवा सुने॥ ४२-४३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण POST.4.43 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 1007) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/skanda/4/43/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)