श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.12.35

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

आहूतो भगवान् राज्ञा याजयित्वा द्विजैर्नृपम्।

उवास कतिचिन्मासान् सुहृदां प्रियकाम्यया॥ ३५

āhūto bhagavān rājñā yājayitvā dvijairnṛpam|

uvāsa katicinmāsān suhṛdāṃ priyakāmyayā|| 35

अर्थ

युधिष्ठिरके निमन्त्रणसे पधारे हुए भगवान् ब्राह्मणोंद्वारा उनका यज्ञ सम्पन्‍न कराकर अपने सुहृद‍् पाण्डवोंकी प्रसन्‍नताके लिये कई महीनोंतक वहीं रहे॥ ३५॥✎ 87 88

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #87 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #88 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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