॥ श्रीहरिः ॥
यत्र क्वचन१ वत्स्यामि सार्वभौम तवाज्ञया।
लक्षये तत्र तत्रापि त्वामात्तेषुशरासनम्॥ ३६
yatra kvacana vatsyāmi sārvabhauma tavājñayā|
lakṣaye tatra tatrāpi tvāmātteṣuśarāsanam|| 36
अर्थ
कलिने कहा—सार्वभौम! आपकी आज्ञासे जहाँ कहीं भी मैं रहनेका विचार करता हूँ, वहीं देखता हूँ कि आप धनुषपर बाण चढ़ाये खड़े हैं॥ ३६॥
यत्र क्वचन वत्स्यामि सार्वभौम तवाज्ञया।
लक्षये तत्र तत्रापि त्वामात्तेषुशरासनम्॥ ३६
कलिने कहा—सार्वभौम! आपकी आज्ञासे जहाँ कहीं भी मैं रहनेका विचार करता हूँ, वहीं देखता हूँ कि आप धनुषपर बाण चढ़ाये खड़े हैं॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.17.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 167) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/17/36/टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—क्व चाथ।
(मुद्रित पृष्ठ 167)