॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.17.38
सूत उवाच
अभ्यर्थितस्तदा तस्मै स्थानानि कलये ददौ।
द्यूतं पानं स्त्रियः सूना यत्राधर्मश्चतुर्विधः॥ ३८
abhyarthitastadā tasmai sthānāni kalaye dadau|
dyūtaṃ pānaṃ striyaḥ sūnā yatrādharmaścaturvidhaḥ|| 38
अर्थ
सूतजी कहते हैं—कलियुगकी प्रार्थना स्वीकार करके राजा परीक्षित्ने उसे चार स्थान दिये—द्यूत, मद्यपान, स्त्री-संग और हिंसा। इन स्थानोंमें क्रमशः असत्य, मद, आसक्ति और निर्दयता—ये चार प्रकारके अधर्म निवास करते हैं ॥ ३८॥