॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.19.27
निगूढजत्रुं पृथुतुङ्गवक्षस-
मावर्तनाभिं वलिवल्गूदरं च।
दिगम्बरं वक्त्रविकीर्णकेशं
प्रलम्बबाहुं स्वमरोत्तमाभम्॥ २७
nigūḍhajatruṃ pṛthutuṅgavakṣasa-
māvartanābhiṃ valivalgūdaraṃ ca|
digambaraṃ vaktravikīrṇakeśaṃ
pralambabāhuṃ svamarottamābham|| 27
अर्थ
हँसली ढकी हुई, छाती चौड़ी और उभरी हुई, नाभि भँवरके समान गहरी तथा उदर बड़ा ही सुन्दर, त्रिवलीसे युक्त था। लंबी-लंबी भुजाएँ थीं, मुखपर घुँघराले बाल बिखरे हुए थे। इस दिगम्बर वेषमें वे श्रेष्ठ देवताके समान तेजस्वी जान पड़ते थे॥ २७॥