श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.19.28

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

श्यामं सदापीच्यवयोऽङ्गलक्ष्म्या

स्त्रीणां मनोज्ञं रुचिरस्मितेन।

प्रत्युत्थितास्ते मुनयः स्वासनेभ्य-

स्तल्लक्षणज्ञा अपि गूढवर्चसम्॥ २८

śyāmaṃ sadāpīcyavayo'ṅgalakṣmyā

strīṇāṃ manojñaṃ rucirasmitena|

pratyutthitāste munayaḥ svāsanebhya-

stallakṣaṇajñā api gūḍhavarcasam|| 28

अर्थ

श्याम रंग था। चित्तको चुरानेवाली भरी जवानी थी। वे शरीरकी छटा और मधुर मुसकानसे स्त्रियोंको सदा ही मनोहर जान पड़ते थे। यद्यपि उन्होंने अपने तेजको छिपा रखा था, फिर भी उनके लक्षण जाननेवाले मुनियोंने उन्हें पहचान लिया और वे सब-के-सब अपने-अपने आसन छोड़कर उनके सम्मानके लिये उठ खड़े हुए॥ २८॥

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