भगवन्! अन्नकी तो बात ही क्या, मैंने जलका भी परित्याग कर दिया है। फिर भी वह असह्य भूख-प्यास (जिसके कारण मैंने मुनिके गलेमें मृत सर्प डालनेका अन्याय किया था) मुझे तनिक भी नहीं सता रही है; क्योंकि मैं आपके मुखकमलसे झरती हुई भगवान्की सुधामयी लीला-कथाका पान कर रहा हूँ॥ १३॥
नैषातिदुःसहा क्षुन्मां त्यक्तोदमपि बाधते।
पिबन्तं त्वन्मुखाम्भोजच्युतं हरिकथामृतम्॥ १३
भगवन्! अन्नकी तो बात ही क्या, मैंने जलका भी परित्याग कर दिया है। फिर भी वह असह्य भूख-प्यास (जिसके कारण मैंने मुनिके गलेमें मृत सर्प डालनेका अन्याय किया था) मुझे तनिक भी नहीं सता रही है; क्योंकि मैं आपके मुखकमलसे झरती हुई भगवान्की सुधामयी लीला-कथाका पान कर रहा हूँ॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.1.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 121) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/13/