श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.1.14

दशम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

सूत उवाच

एवं निशम्य भृगुनन्दन साधुवादं

वैयासकिः स भगवानथ विष्णुरातम्।

प्रत्यर्च्य कृष्णचरितं कलिकल्मषघ्नं

व्याहर्तुमारभत भागवतप्रधानः॥ १४

evaṃ niśamya bhṛgunandana sādhuvādaṃ

vaiyāsakiḥ sa bhagavānatha viṣṇurātam|

pratyarcya kṛṣṇacaritaṃ kalikalmaṣaghnaṃ

vyāhartumārabhata bhāgavatapradhānaḥ|| 14

अर्थ

सूतजी कहते हैं—शौनकजी! भगवान्‌के प्रेमियोंमें अग्रगण्य एवं सर्वज्ञ श्रीशुकदेवजी महाराजने परीक्षित‍्का ऐसा समीचीन प्रश्‍न सुनकर (जो संतोंकी सभामें भगवान्‌की लीलाके वर्णनका हेतु हुआ करता है) उनका अभिनन्दन किया और भगवान् श्रीकृष्णकी उन लीलाओंका वर्णन प्रारम्भ किया, जो समस्त कलिमलोंको सदाके लिये धो डालती है॥ १४॥

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