श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.1.15

दशम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

सम्यग्व्यवसिता बुद्धिस्तव राजर्षिसत्तम।

वासुदेवकथायां ते यज्जाता नैष्ठिकी रतिः१॥ १५

samyagvyavasitā buddhistava rājarṣisattama|

vāsudevakathāyāṃ te yajjātā naiṣṭhikī ratiḥ|| 15

अर्थ

श्रीशुकदेवजीने कहा—भगवान्‌के लीला-रसके रसिक राजर्षे! तुमने जो कुछ निश्‍चय किया है, वह बहुत ही सुन्दर और आदरणीय है; क्योंकि सबके हृदयाराध्य श्रीकृष्णकी लीला-कथा श्रवण करनेमें तुम्हें सहज एवं सुदृढ़ प्रीति प्राप्त हो गयी है॥ १५॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    मतिः।

    (मुद्रित पृष्ठ 121)

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