श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इस प्रकार वसुदेवजीने प्रशंसा आदि सामनीति और भय आदि भेदनीतिसे कंसको बहुत समझाया। परन्तु वह क्रूर तो राक्षसोंका अनुयायी हो रहा था; इसलिये उसने अपने घोर संकल्पको नहीं छोड़ा॥ ४६॥
एवं स सामभिर्भेदैर्बोध्यमानोऽपि दारुणः।
न न्यवर्तत कौरव्य पुरुषादाननुव्रतः॥ ४६
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इस प्रकार वसुदेवजीने प्रशंसा आदि सामनीति और भय आदि भेदनीतिसे कंसको बहुत समझाया। परन्तु वह क्रूर तो राक्षसोंका अनुयायी हो रहा था; इसलिये उसने अपने घोर संकल्पको नहीं छोड़ा॥ ४६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.1.46 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 125) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/46/