वसुदेवजीने कंसका विकट हठ देखकर यह विचार किया कि किसी प्रकार यह समय तो टाल ही देना चाहिये। तब वे इस निश्चयपर पहुँचे॥ ४७॥
निर्बन्धं तस्य तं ज्ञात्वा विचिन्त्यानकदुन्दुभिः।
प्राप्तं कालं प्रतिव्योढुमिदं तत्रान्वपद्यत॥ ४७
वसुदेवजीने कंसका विकट हठ देखकर यह विचार किया कि किसी प्रकार यह समय तो टाल ही देना चाहिये। तब वे इस निश्चयपर पहुँचे॥ ४७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.1.47 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 125) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/47/