यह शरीर एक साधारण-सी वस्तु है। प्रकृतिसे पैदा होता है और उसीमें समा जाता है। ऐसी स्थितिमें मूर्ख पशुओंके सिवा और ऐसा कौन बुद्धिमान् है जो इसको अपना आत्मा मानकर दूसरोंको कष्ट पहुँचायेगा, उनके प्राण लेगा॥ १२॥
एवं साधारणं देहमव्यक्तप्रभवाप्ययम्।
को विद्वानात्मसात् कृत्वा हन्ति जन्तूनृतेऽसतः॥ १२
यह शरीर एक साधारण-सी वस्तु है। प्रकृतिसे पैदा होता है और उसीमें समा जाता है। ऐसी स्थितिमें मूर्ख पशुओंके सिवा और ऐसा कौन बुद्धिमान् है जो इसको अपना आत्मा मानकर दूसरोंको कष्ट पहुँचायेगा, उनके प्राण लेगा॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.10.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 191) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/10/12/