जो दुष्ट श्रीमदसे अंधे हो रहे हैं, उनकी आँखोंमें ज्योति डालनेके लिये दरिद्रता ही सबसे बड़ा अंजन है; क्योंकि दरिद्र यह देख सकता है कि दूसरे प्राणी भी मेरे ही जैसे हैं॥ १३॥
असतः श्रीमदान्धस्य दारिद्र्यं परमञ्जनम्।
आत्मौपम्येन भूतानि दरिद्रः परमीक्षते॥ १३
जो दुष्ट श्रीमदसे अंधे हो रहे हैं, उनकी आँखोंमें ज्योति डालनेके लिये दरिद्रता ही सबसे बड़ा अंजन है; क्योंकि दरिद्र यह देख सकता है कि दूसरे प्राणी भी मेरे ही जैसे हैं॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.10.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 191) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/10/13/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#2064 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): दारिद्रॺं पर → दारिद्र्यं पर