श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.10.23

दशम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

एवमुक्त्वा स देवर्षिर्गतो नारायणाश्रमम्।

नलकूबरमणिग्रीवावासतुर्यमलार्जुनौ ॥ २३

evamuktvā sa devarṣirgato nārāyaṇāśramam|

nalakūbaramaṇigrīvāvāsaturyamalārjunau || 23

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—देवर्षि नारद इस प्रकार कहकर भगवान् नर-नारायणके आश्रमपर चले गये‡। नलकूबर और मणिग्रीव—ये दोनों एक ही साथ अर्जुन वृक्ष होकर यमलार्जुन नामसे प्रसिद्ध हुए॥ २३॥

टिप्पणियाँ

  1. ‡

    १. शाप वरदानसे तपस्या क्षीण होती है। नलकूबर-मणिग्रीवको शाप देनेके पश्‍चात् नर-नारायण-आश्रमकी यात्रा करनेका यह अभिप्राय है कि फिरसे तपःसंचय कर लिया जाय।

    २. मैंने यक्षोंपर जो अनुग्रह किया है, वह बिना तपस्याके पूर्ण नहीं हो सकता है, इसलिये।

    ३. अपने आराध्यदेव एवं गुरुदेव नारायणके सम्मुख अपना कृत्य निवेदन करनेके लिये।

    (मुद्रित पृष्ठ 192)

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