श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.10.22

दशम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

वासुदेवस्य सान्‍निध्यं लब्ध्वा दिव्यशरच्छते।

वृत्ते स्वर्लोकतां भूयो लब्धभक्ती भविष्यतः॥ २२

vāsudevasya sānnidhyaṃ labdhvā divyaśaracchate|

vṛtte svarlokatāṃ bhūyo labdhabhaktī bhaviṣyataḥ|| 22

अर्थ

इसलिये ये दोनों अब वृक्षयोनिमें जानेके योग्य हैं। ऐसा होनेसे इन्हें फिर इस प्रकारका अभिमान न होगा। वृक्षयोनिमें जानेपर भी मेरी कृपासे इन्हें भगवान्‌की स्मृति बनी रहेगी और मेरे अनुग्रहसे देवताओंके सौ वर्ष बीतनेपर इन्हें भगवान् श्रीकृष्णका सान्‍निध्य प्राप्त होगा; और फिर भगवान्‌के चरणोंमें परम प्रेम प्राप्त करके ये अपने लोकमें चले आयेंगे॥ २१-२२॥

यह अर्थ श्लोक 21–22 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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