इसलिये ये दोनों अब वृक्षयोनिमें जानेके योग्य हैं। ऐसा होनेसे इन्हें फिर इस प्रकारका अभिमान न होगा। वृक्षयोनिमें जानेपर भी मेरी कृपासे इन्हें भगवान्की स्मृति बनी रहेगी और मेरे अनुग्रहसे देवताओंके सौ वर्ष बीतनेपर इन्हें भगवान् श्रीकृष्णका सान्निध्य प्राप्त होगा; और फिर भगवान्के चरणोंमें परम प्रेम प्राप्त करके ये अपने लोकमें चले आयेंगे॥ २१-२२॥
यह अर्थ श्लोक 21–22 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
अतोऽर्हतः स्थावरतां स्यातां नैवं यथा पुनः।
स्मृतिः स्यान्मत्प्रसादेन तत्रापि मदनुग्रहात्॥ २१
इसलिये ये दोनों अब वृक्षयोनिमें जानेके योग्य हैं। ऐसा होनेसे इन्हें फिर इस प्रकारका अभिमान न होगा। वृक्षयोनिमें जानेपर भी मेरी कृपासे इन्हें भगवान्की स्मृति बनी रहेगी और मेरे अनुग्रहसे देवताओंके सौ वर्ष बीतनेपर इन्हें भगवान् श्रीकृष्णका सान्निध्य प्राप्त होगा; और फिर भगवान्के चरणोंमें परम प्रेम प्राप्त करके ये अपने लोकमें चले आयेंगे॥ २१-२२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.10.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 192) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/10/21/