श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.10.28

दशम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

तत्र श्रिया परमया ककुभः स्फुरन्तौ

सिद्धावुपेत्य कुजयोरिव जातवेदाः।

कृष्णं प्रणम्य शिरसाखिललोकनाथं

बद्धांजली विरजसाविदमूचतुः स्म॥ २८

tatra śriyā paramayā kakubhaḥ sphurantau

siddhāvupetya kujayoriva jātavedāḥ|

kṛṣṇaṃ praṇamya śirasākhilalokanāthaṃ

baddhāṃjalī virajasāvidamūcatuḥ sma|| 28

अर्थ

उन दोनों वृक्षोंमेंसे अग्‍निके समान तेजस्वी दो सिद्ध पुरुष निकले। उनके चमचमाते हुए सौन्दर्यसे दिशाएँ दमक उठीं। उन्होंने सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी भगवान् श्रीकृष्णके पास आकर उनके चरणोंमें सिर रखकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर शुद्ध हृदयसे वे उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे—॥ २८॥

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