श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.10.27

दशम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

बालेन निष्कर्षयतान्वगुलूखलं तद्

दामोदरेण तरसोत्कलिताङ्‌घ्रिबन्धौ।

निष्पेततुः परमविक्रमितातिवेप-

स्कन्धप्रवालविटपौ कृतचण्डशब्दौ॥ २७

bālena niṣkarṣayatānvagulūkhalaṃ tad

dāmodareṇa tarasotkalitāṅghribandhau|

niṣpetatuḥ paramavikramitātivepa-

skandhapravālaviṭapau kṛtacaṇḍaśabdau|| 27

अर्थ

दामोदरभगवान् श्रीकृष्णकी कमरमें रस्सी कसी हुई थी। उन्होंने अपने पीछे लुढ़कते हुए ऊखलको ज्यों ही तनिक जोरसे खींचा, त्यों ही पेड़ोंकी सारी जड़ें उखड़ गयी‡। समस्त बल-विक्रमके केन्द्र भगवान्‌का तनिक-सा जोर लगते ही पेड़ोंके तने, शाखाएँ, छोटी-छोटी डालियाँ और एक-एक पत्ते काँप उठे और वे दोनों बड़े जोरसे तड़तड़ाते हुए पृथ्वीपर गिर पड़े॥ २७॥

टिप्पणियाँ

  1. ‡

    जो भगवान्‌के गुण (भक्त-वत्सल्य आदि सद्गुण या रस्सी) से बँधा हुआ है, वह तिर्यक् गति (पशु-पक्षी या टेढ़ी चालवाला) ही क्यों न हो—दूसरोंका उद्धार कर सकता है।

    अपने अनुयायीके द्वारा किया हुआ काम जितना यशस्कर होता है, उतना अपने हाथसे नहीं। मानो यही सोचकर अपने पीछे-पीछे चलनेवाले ऊखलके द्वारा उनका उद्धार करवाया।

    (मुद्रित पृष्ठ 193)

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