श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.12.11

दशम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

इत्थं सतां ब्रह्मसुखानुभूत्या

दास्यं गतानां परदैवतेन।

मायाश्रितानां नरदारकेण

साकं विजह्रुः कृतपुण्यपुंजाः॥ ११

itthaṃ satāṃ brahmasukhānubhūtyā

dāsyaṃ gatānāṃ paradaivatena|

māyāśritānāṃ naradārakeṇa

sākaṃ vijahruḥ kṛtapuṇyapuṃjāḥ|| 11

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्ण ज्ञानी संतोंके लिये स्वयं ब्रह्मानन्दके मूर्तिमान् अनुभव हैं। दास्यभावसे युक्त भक्तोंके लिये वे उनके आराध्यदेव, परम ऐश्‍वर्यशाली परमेश्‍वर हैं। और माया-मोहित विषयान्धोंके लिये वे केवल एक मनुष्य-बालक हैं । उन्हीं भगवान्‌के साथ वे महान् पुण्यात्मा ग्वालबाल तरह-तरहके खेल खेल रहे हैं॥ ११॥✎ 1414 1415

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1414 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): छींका → छीका
  • #1415 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): छींके, → छीके,

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