श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.12.12

दशम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

यत्पादपांसुर्बहुजन्मकृच्छ्रतो

धृतात्मभिर्योगिभिरप्यलभ्यः ।

स एव यद‍्दृग्विषयः स्वयं स्थितः

किं वर्ण्यते दिष्टमतो व्रजौकसाम्॥ १२

yatpādapāṃsurbahujanmakṛcchrato

dhṛtātmabhiryogibhirapyalabhyaḥ |

sa eva yaddṛgviṣayaḥ svayaṃ sthitaḥ

kiṃ varṇyate diṣṭamato vrajaukasām|| 12

अर्थ

बहुत जन्मोंतक श्रम और कष्ट उठाकर जिन्होंने अपनी इन्द्रियों और अन्तःकरणको वशमें कर लिया है, उन योगियोंके लिये भी भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी रज अप्राप्य है। वही भगवान् स्वयं जिन व्रजवासी ग्वालबालोंकी आँखोंके सामने रहकर सदा खेल खेलते हैं, उनके सौभाग्यकी महिमा इससे अधिक क्या कही जाय॥ १२॥✎ 1414 1415

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1414 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): छींका → छीका
  • #1415 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): छींके, → छीके,

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