श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.12.37

दशम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

एतत् कौमारजं कर्म हरेरात्माहिमोक्षणम्।

मृत्योः पौगण्डके बाला दृष्ट्वोचुर्विस्मिता व्रजे॥ ३७

etat kaumārajaṃ karma harerātmāhimokṣaṇam|

mṛtyoḥ paugaṇḍake bālā dṛṣṭvocurvismitā vraje|| 37

अर्थ

यह जो भगवान्‌ने अपने ग्वालबालोंको मृत्युके मुखसे बचाया था और अघासुरको मोक्ष-दान किया था, वह लीला भगवान्‌ने अपनी कुमार अवस्थामें अर्थात् पाँचवें वर्षमें ही की थी। ग्वालबालोंने उसे उसी समय देखा भी था, परन्तु पौगण्ड अवस्था अर्थात् छठे वर्षमें अत्यन्त आश्‍चर्यचकित होकर व्रजमें उसका वर्णन किया॥ ३७॥✎ 1659

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1659 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: ब्रह्म-लोकके → ब्रह्मलोकके

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