श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.12.36

दशम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

राजन्‍नाजगरं चर्म शुष्कं वृन्दावनेऽद्भुतम्।

व्रजौकसां बहुतिथं बभूवाक्रीडगह्वरम्॥ ३६

rājannājagaraṃ carma śuṣkaṃ vṛndāvane'dbhutam|

vrajaukasāṃ bahutithaṃ babhūvākrīḍagahvaram|| 36

अर्थ

परीक्षित्! जब वृन्दावनमें अजगरका वह चाम सूख गया, तब वह व्रजवासियोंके लिये बहुत दिनोंतक खेलनेकी एक अद्भुत गुफा-सी बना रहा॥ ३६॥✎ 1659

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1659 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: ब्रह्म-लोकके → ब्रह्मलोकके

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