॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.13.2
सतामयं सारभृतां निसर्गो
यदर्थवाणीश्रुतिचेतसामपि ।
प्रतिक्षणं नव्यवदच्युतस्य यत्
स्त्रिया विटानामिव साधुवार्ता॥ २
satāmayaṃ sārabhṛtāṃ nisargo
yadarthavāṇīśruticetasāmapi |
pratikṣaṇaṃ navyavadacyutasya yat
striyā viṭānāmiva sādhuvārtā|| 2
अर्थ
रसिक संतोंकी वाणी, कान और हृदय भगवान्की लीलाके गान, श्रवण और चिन्तनके लिये ही होते हैं—उनका यह स्वभाव ही होता है कि वे क्षण-प्रतिक्षण भगवान्की लीलाओंको अपूर्व रसमयी और नित्य-नूतन अनुभव करते रहें—ठीक वैसे ही, जैसे लम्पट पुरुषोंको स्त्रियोंकी चर्चामें नया-नया रस जान पड़ता है॥ २॥✎ 1660