श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.13.3

दशम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

शृणुष्वावहितो राजन्‍नपि गुह्यं वदामि ते।

ब्रूयुः स्निग्धस्य शिष्यस्य गुरवो गुह्यमप्युत॥ ३

śṛṇuṣvāvahito rājannapi guhyaṃ vadāmi te|

brūyuḥ snigdhasya śiṣyasya guravo guhyamapyuta|| 3

अर्थ

परीक्षित्! तुम एकाग्र चित्तसे श्रवण करो। यद्यपि भगवान्‌की यह लीला अत्यन्त रहस्यमयी है, फिर भी मैं तुम्हें सुनाता हूँ। क्योंकि दयालु आचार्यगण अपने प्रेमी शिष्यको गुप्त रहस्य भी बतला दिया करते हैं॥ ३॥✎ 1660

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1660 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: रस-मयी → रसमयी

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