श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.13.24

दशम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

गावस्ततो गोष्ठमुपेत्य सत्वरं

हुंकारघोषैः परिहूतसंगतान्।

स्वकान् स्वकान् वत्सतरानपाययन्

मुहुर्लिहन्त्यः स्रवदौधसं पयः॥ २४

gāvastato goṣṭhamupetya satvaraṃ

huṃkāraghoṣaiḥ parihūtasaṃgatān|

svakān svakān vatsatarānapāyayan

muhurlihantyaḥ sravadaudhasaṃ payaḥ|| 24

अर्थ

ग्वालिनोंके समान गौएँ भी जब जंगलोंमेंसे चरकर जल्दी-जल्दी लौटतीं और उनकी हुंकार सुनकर उनके प्यारे बछड़े दौड़कर उनके पास आ जाते, तब वे बार-बार उन्हें अपनी जीभसे चाटतीं और अपना दूध पिलातीं । उस समय स्नेहकी अधिकताके कारण उनके थनोंसे स्वयं ही दूधकी धारा बहने लगती॥ २४॥✎ 1927

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1927 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): व्रज-वासियोंकी → व्रजवासियोंकी

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