श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.13.33

दशम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

तदीक्षणोत्प्रेमरसाप्लुताशया

जातानुरागा गतमन्यवोऽर्भकान्।

उदुह्य दोर्भिः परिरभ्य मूर्धनि

घ्राणैरवापुः परमां मुदं ते॥ ३३

tadīkṣaṇotpremarasāplutāśayā

jātānurāgā gatamanyavo'rbhakān|

uduhya dorbhiḥ parirabhya mūrdhani

ghrāṇairavāpuḥ paramāṃ mudaṃ te|| 33

अर्थ

अपने बच्चोंको देखते ही उनका हृदय प्रेमरससे सराबोर हो गया। बालकोंके प्रति अनुरागकी बाढ़ आ गयी, उनका क्रोध न जाने कहाँ हवा हो गया। उन्होंने अपने-अपने बालकोंको गोदमें उठाकर हृदयसे लगा लिया और उनका मस्तक सूँघकर अत्यन्त आनन्दित हुए॥ ३३॥

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