श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.13.37

दशम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

केयं वा कुत आयाता दैवी वा नार्युतासुरी।

प्रायो मायास्तु मे भर्तुर्नान्या मेऽपि विमोहिनी॥ ३७

keyaṃ vā kuta āyātā daivī vā nāryutāsurī|

prāyo māyāstu me bharturnānyā me'pi vimohinī|| 37

अर्थ

यह कौन-सी माया है? कहाँसे आयी है? यह किसी देवताकी है, मनुष्यकी है अथवा असुरोंकी? परन्तु क्या ऐसा भी सम्भव है? नहीं-नहीं, यह तो मेरे प्रभुकी ही माया है। और किसीकी मायामें ऐसी सामर्थ्य नहीं, जो मुझे भी मोहित कर ले’॥ ३७॥

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