vrajasya sātmanastokeṣvapūrvaṃ prema vardhate|| 36
अर्थ
‘यह कैसी विचित्र बात है! सर्वात्मा श्रीकृष्णमें व्रजवासियोंका और मेरा जैसा अपूर्व स्नेह है, वैसा ही इन बालकों और बछड़ोंपर भी बढ़ता जा रहा है॥ ३६॥
किमेतदद्भुतमिव वासुदेवेऽखिलात्मनि।
व्रजस्य सात्मनस्तोकेष्वपूर्वं प्रेम वर्धते॥ ३६
‘यह कैसी विचित्र बात है! सर्वात्मा श्रीकृष्णमें व्रजवासियोंका और मेरा जैसा अपूर्व स्नेह है, वैसा ही इन बालकों और बछड़ोंपर भी बढ़ता जा रहा है॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.13.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 216) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/13/36/