श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.13.35

दशम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

व्रजस्य रामः प्रेमर्धेर्वीक्ष्यौत्कण्ठ्यमनुक्षणम्।

मुक्तस्तनेष्वपत्येष्वप्यहेतुविदचिन्तयत्॥ ३५

vrajasya rāmaḥ premardhervīkṣyautkaṇṭhyamanukṣaṇam|

muktastaneṣvapatyeṣvapyahetuvidacintayat|| 35

अर्थ

बलरामजीने देखा कि व्रजवासी गोप, गौएँ और ग्वालिनोंकी उन सन्तानोंपर भी, जिन्होंने अपनी माका दूध पीना छोड़ दिया है, क्षण-प्रतिक्षण प्रेम-सम्पत्ति और उसके अनुरूप उत्कण्ठा बढ़ती ही जा रही है, तब वे विचारमें पड़ गये, क्योंकि उन्हें इसका कारण मालूम न था॥ ३५॥✎ 1420

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1420 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): माँका → माका

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