श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.13.64

दशम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

शनैरथोत्थाय विमृज्य लोचने

मुकुन्दमुद्वीक्ष्य विनम्रकन्धरः।

कृतांजलिः प्रश्रयवान् समाहितः

सवेपथुर्गद्गदयैलतेलया ॥ ६४

śanairathotthāya vimṛjya locane

mukundamudvīkṣya vinamrakandharaḥ|

kṛtāṃjaliḥ praśrayavān samāhitaḥ

savepathurgadgadayailatelayā || 64

अर्थ

फिर धीरे-धीरे उठे और अपने नेत्रोंके आँसू पोंछे। प्रेम और मुक्तिके एकमात्र उद्गम भगवान्‌को देखकर उनका सिर झुक गया। वे काँपने लगे। अंजलि बाँधकर बड़ी नम्रता और एकाग्रताके साथ गद्गद वाणीसे वे भगवान्‌की स्तुति करने लगे॥ ६४॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे
पूर्वार्धे त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥

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