श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.14.20

दशम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

सुरेष्वृषिष्वीश तथैव नृष्वपि

तिर्यक्षु यादस्स्वपि तेऽजनस्य।

जन्मासतां दुर्मदनिग्रहाय

प्रभो विधातः सदनुग्रहाय च॥ २०

sureṣvṛṣiṣvīśa tathaiva nṛṣvapi

tiryakṣu yādassvapi te'janasya|

janmāsatāṃ durmadanigrahāya

prabho vidhātaḥ sadanugrahāya ca|| 20

अर्थ

प्रभो! आप सारे जगत‍्के स्वामी और विधाता हैं। अजन्मा होनेपर भी आप देवता, ऋषि, मनुष्य, पशु-पक्षी और जलचर आदि योनियोंमें अवतार ग्रहण करते हैं—इसलिये कि इन रूपोंके द्वारा दुष्ट पुरुषोंका घमंड तोड़ दें और सत्पुरुषोंपर अनुग्रह करें॥ २०॥

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