॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.14.21
को वेत्ति भूमन् भगवन् परात्मन्
योगेश्वरोतीर्भवतस्त्रिलोक्याम् ।
क्व वा कथं वा कति वा कदेति
विस्तारयन् क्रीडसि योगमायाम्॥ २१
ko vetti bhūman bhagavan parātman
yogeśvarotīrbhavatastrilokyām |
kva vā kathaṃ vā kati vā kadeti
vistārayan krīḍasi yogamāyām|| 21
अर्थ
भगवन्! आप अनन्त परमात्मा और योगेश्वर हैं । जिस समय आप अपनी योगमायाका विस्तार करके लीला करने लगते हैं, उस समय त्रिलोकीमें ऐसा कौन है, जो यह जान सके कि आपकी लीला कहाँ, किसलिये, कब और कितनी होती है॥ २१॥