श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.14.22

दशम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

तस्मादिदं जगदशेषमसत्स्वरूपं

स्वप्नाभमस्तधिषणं पुरुदुःखदुःखम्।

त्वय्येव नित्यसुखबोधतनावनन्ते

मायात उद्यदपि यत् सदिवावभाति॥ २२

tasmādidaṃ jagadaśeṣamasatsvarūpaṃ

svapnābhamastadhiṣaṇaṃ puruduḥkhaduḥkham|

tvayyeva nityasukhabodhatanāvanante

māyāta udyadapi yat sadivāvabhāti|| 22

अर्थ

इसलिये यह सम्पूर्ण जगत् स्वप्नके समान असत्य, अज्ञानरूप और दुःख-पर-दुःख देनेवाला है। आप परमानन्द, परम ज्ञानस्वरूप एवं अनन्त हैं। यह मायासे उत्पन्‍न एवं विलीन होनेपर भी आपमें आपकी सत्तासे सत्यके समान प्रतीत होता है॥ २२॥

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