श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.14.36

दशम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

तावद् रागादयः स्तेनास्तावत् कारागृहं गृहम्।

तावन्मोहोऽङ्‌घ्रिनिगडो यावत् कृष्ण न ते जनाः॥ ३६

tāvad rāgādayaḥ stenāstāvat kārāgṛhaṃ gṛham|

tāvanmoho'ṅghrinigaḍo yāvat kṛṣṇa na te janāḥ|| 36

अर्थ

सच्चिदानन्दस्वरूप श्यामसुन्दर! तभीतक राग-द्वेष आदि दोष चोरोंके समान सर्वस्व अपहरण करते रहते हैं, तभीतक घर और उसके सम्बन्धी कैदकी तरह सम्बन्धके बन्धनोंमें बाँध रखते हैं और तभीतक मोह पैरकी बेड़ियोंकी तरह जकड़े रखता है—जबतक जीव आपका नहीं हो जाता॥ ३६॥✎ 1422 2072

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1422 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): राक्षसोंको → राक्षसोंके
  • #2072 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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