श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.14.37

दशम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

प्रपञ्चं निष्प्रपञ्चोऽपि विडम्बयसि भूतले।

प्रपन्‍नजनतानन्दसन्दोहं प्रथितुं प्रभो॥ ३७

prapañcaṃ niṣprapañco'pi viḍambayasi bhūtale|

prapannajanatānandasandohaṃ prathituṃ prabho|| 37

अर्थ

प्रभो! आप विश्‍वके बखेड़ेसे सर्वथा रहित हैं, फिर भी अपने शरणागत भक्तजनोंको अनन्त आनन्द वितरण करनेके लिये पृथ्वीमें अवतार लेकर विश्‍वके समान ही लीला-विलासका विस्तार करते हैं॥ ३७॥✎ 1422 2072

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1422 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): राक्षसोंको → राक्षसोंके
  • #2072 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें