श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.14.38

दशम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

जानन्त एव जानन्तु किं बहूक्त्या न मे प्रभो।

मनसो वपुषो वाचो वैभवं तव गोचरः॥ ३८

jānanta eva jānantu kiṃ bahūktyā na me prabho|

manaso vapuṣo vāco vaibhavaṃ tava gocaraḥ|| 38

अर्थ

मेरे स्वामी! बहुत कहनेकी आवश्यकता नहीं—जो लोग आपकी महिमा जानते हैं, वे जानते रहें; मेरे मन, वाणी और शरीर तो आपकी महिमा जाननेमें सर्वथा असमर्थ हैं॥ ३८॥✎ 1422 2072

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1422 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): राक्षसोंको → राक्षसोंके
  • #2072 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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