श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.14.4

दशम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

श्रेयःस्रुतिं भक्तिमुदस्य ते विभो

क्लिश्यन्ति ये केवलबोधलब्धये।

तेषामसौ क्लेशल एव शिष्यते

नान्यद्यथा स्थूलतुषावघातिनाम्॥ ४

śreyaḥsrutiṃ bhaktimudasya te vibho

kliśyanti ye kevalabodhalabdhaye|

teṣāmasau kleśala eva śiṣyate

nānyadyathā sthūlatuṣāvaghātinām|| 4

अर्थ

भगवन्! आपकी भक्ति सब प्रकारके कल्याणका मूलस्रोत— उद्गम है। जो लोग उसे छोड़कर केवल ज्ञानकी प्राप्तिके लिये श्रम उठाते और दुःख भोगते हैं, उनको बस, क्लेश-ही क्लेश हाथ लगता है, और कुछ नहीं—जैसे थोथी भूसी कूटनेवालेको केवल श्रम ही मिलता है, चावल नहीं॥ ४॥✎ 1931

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1931 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): स्वयं-प्रकाश → स्वयंप्रकाश

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