गोपियोंने अपने नेत्ररूप भ्रमरोंसे भगवान्के मुखारविन्दका मकरन्द-रस पान करके दिनभरके विरहकी जलन शान्त की। और भगवान्ने भी उनकी लाजभरी हँसी तथा विनयसे युक्त प्रेमभरी तिरछी चितवनका सत्कार स्वीकार करके व्रजमें प्रवेश किया॥ ४३॥
पीत्वा मुकुन्दमुखसारघमक्षिभृङ्गै-
स्तापं जहुर्विरहजं व्रजयोषितोऽह्नि।
तत्सत्कृतिं समधिगम्य विवेश गोष्ठं
सव्रीडहासविनयं यदपांगमोक्षम्॥ ४३
गोपियोंने अपने नेत्ररूप भ्रमरोंसे भगवान्के मुखारविन्दका मकरन्द-रस पान करके दिनभरके विरहकी जलन शान्त की। और भगवान्ने भी उनकी लाजभरी हँसी तथा विनयसे युक्त प्रेमभरी तिरछी चितवनका सत्कार स्वीकार करके व्रजमें प्रवेश किया॥ ४३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.15.43 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 237) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/43/