श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.15.43

दशम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

पीत्वा मुकुन्दमुखसारघमक्षिभृङ्गै-

स्तापं जहुर्विरहजं व्रजयोषितोऽह्नि।

तत्सत्कृतिं समधिगम्य विवेश गोष्ठं

सव्रीडहासविनयं यदपांगमोक्षम्॥ ४३

pītvā mukundamukhasāraghamakṣibhṛṅgai-

stāpaṃ jahurvirahajaṃ vrajayoṣito'hni|

tatsatkṛtiṃ samadhigamya viveśa goṣṭhaṃ

savrīḍahāsavinayaṃ yadapāṃgamokṣam|| 43

अर्थ

गोपियोंने अपने नेत्ररूप भ्रमरोंसे भगवान्‌के मुखारविन्दका मकरन्द-रस पान करके दिनभरके विरहकी जलन शान्त की। और भगवान्‌ने भी उनकी लाजभरी हँसी तथा विनयसे युक्त प्रेमभरी तिरछी चितवनका सत्कार स्वीकार करके व्रजमें प्रवेश किया॥ ४३॥

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