श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.15.44

दशम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

तयोर्यशोदारोहिण्यौ पुत्रयोः पुत्रवत्सले।

यथाकामं यथाकालं व्यधत्तां परमाशिषः॥ ४४

tayoryaśodārohiṇyau putrayoḥ putravatsale|

yathākāmaṃ yathākālaṃ vyadhattāṃ paramāśiṣaḥ|| 44

अर्थ

उधर यशोदामैया और रोहिणीजीका हृदय वात्सल्यस्नेहसे उमड़ रहा था। उन्होंने श्याम और रामके घर पहुँचते ही उनकी इच्छाके अनुसार तथा समयके अनुरूप पहलेसे ही सोच-सँजोकर रखी हुई वस्तुएँ उन्हें खिलायीं-पिलायीं और पहनायीं॥ ४४॥

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