उस समय जेठ-आषाढ़के घामसे गौएँ और ग्वालबाल अत्यन्त पीड़ित हो रहे थे। प्याससे उनका कण्ठ सूख रहा था। इसलिये उन्होंने यमुनाजीका विषैला जल पी लिया॥ ४८॥✎ 2074
अथ गावश्च गोपाश्च निदाघातपपीडिताः।
दुष्टं जलं पपुस्तस्यास्तृषार्ता विषदूषितम्॥ ४८
उस समय जेठ-आषाढ़के घामसे गौएँ और ग्वालबाल अत्यन्त पीड़ित हो रहे थे। प्याससे उनका कण्ठ सूख रहा था। इसलिये उन्होंने यमुनाजीका विषैला जल पी लिया॥ ४८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.15.48 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 237) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/48/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)