॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.16.18
ते तत्र तत्राब्जयवांकुशाशनि-
ध्वजोपपन्नानि पदानि विश्पतेः।
मार्गे गवामन्यपदान्तरान्तरे
निरीक्षमाणा ययुरंग सत्वराः॥ १८
te tatra tatrābjayavāṃkuśāśani-
dhvajopapannāni padāni viśpateḥ|
mārge gavāmanyapadāntarāntare
nirīkṣamāṇā yayuraṃga satvarāḥ|| 18
अर्थ
परीक्षित्! मार्गमें गौओं और दूसरोंके चरणचिह्नोंके बीच-बीचमें भगवान्के चरणचिह्न भी दीख जाते थे। उनमें कमल, जौ, अंकुश, वज्र और ध्वजाके चिह्न बहुत ही स्पष्ट थे। उन्हें देखते हुए वे बहुत शीघ्रतासे चले॥ १८॥