श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.16.18

दशम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

ते तत्र तत्राब्जयवांकुशाशनि-

ध्वजोपपन्‍नानि पदानि विश्पतेः।

मार्गे गवामन्यपदान्तरान्तरे

निरीक्षमाणा ययुरंग सत्वराः॥ १८

te tatra tatrābjayavāṃkuśāśani-

dhvajopapannāni padāni viśpateḥ|

mārge gavāmanyapadāntarāntare

nirīkṣamāṇā yayuraṃga satvarāḥ|| 18

अर्थ

परीक्षित्! मार्गमें गौओं और दूसरोंके चरणचिह्नोंके बीच-बीचमें भगवान्‌के चरणचिह्न भी दीख जाते थे। उनमें कमल, जौ, अंकुश, वज्र और ध्वजाके चिह्न बहुत ही स्पष्ट थे। उन्हें देखते हुए वे बहुत शीघ्रतासे चले॥ १८॥

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