श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.16.26

दशम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

एवं परिभ्रमहतौजसमुन्‍नतांस-

मानम्य तत्पृथुशिरस्स्वधिरूढ आद्यः।

तन्मूर्धरत्‍ननिकरस्पर्शातिताम्र-

पादाम्बुजोऽखिलकलादिगुरुर्ननर्त ॥ २६

evaṃ paribhramahataujasamunnatāṃsa-

mānamya tatpṛthuśirassvadhirūḍha ādyaḥ|

tanmūrdharatnanikarasparśātitāmra-

pādāmbujo'khilakalādigururnanarta || 26

अर्थ

इस प्रकार पैंतरा बदलते-बदलते उसका बल क्षीण हो गया। तब भगवान् श्रीकृष्णने उसके बड़े-बड़े सिरोंको तनिक दबा दिया और उछलकर उनपर सवार हो गये। कालिय नागके मस्तकोंपर बहुत-सी लाल-लाल मणियाँ थीं। उनके स्पर्शसे भगवान्‌के सुकुमार तलुओंकी लालिमा और भी बढ़ गयी। नृत्य-गान आदि समस्त कलाओंके आदिप्रवर्तक भगवान् श्रीकृष्ण उसके सिरोंपर कलापूर्ण नृत्य करने लगे॥ २६॥✎ 1983 2076

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1983 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): पैंरोंकी → पैरोंकी
  • #2076 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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