श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.16.33

दशम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

नागपत्‍न्य ऊचुः

न्याय्यो हि दण्डः कृतकिल्बिषेऽस्मिं-

स्तवावतारः खलनिग्रहाय।

रिपोः सुतानामपि तुल्यदृष्टे-

र्धत्से दमं फलमेवानुशंसन्॥ ३३

nyāyyo hi daṇḍaḥ kṛtakilbiṣe'smiṃ-

stavāvatāraḥ khalanigrahāya|

ripoḥ sutānāmapi tulyadṛṣṭe-

rdhatse damaṃ phalamevānuśaṃsan|| 33

अर्थ

नागपत्‍नियोंने कहा—प्रभो! आपका यह अवतार ही दुष्टोंको दण्ड देनेके लिये हुआ है। इसलिये इस अपराधीको दण्ड देना सर्वथा उचित है। आपकी दृष्टिमें शत्रु और पुत्रका कोई भेदभाव नहीं है। इसलिये आप जो किसीको दण्ड देते हैं, वह उसके पापोंका प्रायश्‍चित्त कराने और उसका परम कल्याण करनेके लिये ही॥ ३३॥

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