श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.16.34

दशम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

अनुग्रहोऽयं भवतः कृतो हि नो

दण्डोऽसतां ते खलु कल्मषापहः।

यद् दन्दशूकत्वममुष्य देहिनः

क्रोधोऽपि तेऽनुग्रह एव सम्मतः॥ ३४

anugraho'yaṃ bhavataḥ kṛto hi no

daṇḍo'satāṃ te khalu kalmaṣāpahaḥ|

yad dandaśūkatvamamuṣya dehinaḥ

krodho'pi te'nugraha eva sammataḥ|| 34

अर्थ

आपने हमलोगोंपर यह बड़ा ही अनुग्रह किया। यह तो आपका कृपा-प्रसाद ही है। क्योंकि आप जो दुष्टोंको दण्ड देते हैं, उससे उनके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। इस सर्पके अपराधी होनेमें तो कोई सन्देह ही नहीं है। यदि यह अपराधी न होता तो इसे सर्पकी योनि ही क्यों मिलती? इसलिये हम सच्चे हृदयसे आपके इस क्रोधको भी आपका अनुग्रह ही समझती हैं॥ ३४॥

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