॥ श्रीहरिः ॥
अथ सप्तदशोऽध्यायः
कालियके कालियदहमें आनेकी कथा तथा भगवान्का
व्रजवासियोंको दावानलसे बचाना
राजोवाच
नागालयं रमणकं कस्मात्तत्याज कालियः।
कृतं किं वा सुपर्णस्य तेनैकेनासमंजसम्॥ १
nāgālayaṃ ramaṇakaṃ kasmāttatyāja kāliyaḥ|
kṛtaṃ kiṃ vā suparṇasya tenaikenāsamaṃjasam|| 1
अर्थ
राजा परीक्षित्ने पूछा—भगवन्! कालिय नागने नागोंके निवासस्थान रमणक द्वीपको क्यों छोड़ा था? और उस अकेलेने ही गरुडजीका कौन-सा अपराध किया था?॥ १॥
नागालयं रमणकं कस्मात्तत्याज कालियः।
कृतं किं वा सुपर्णस्य तेनैकेनासमंजसम्॥ १
राजा परीक्षित्ने पूछा—भगवन्! कालिय नागने नागोंके निवासस्थान रमणक द्वीपको क्यों छोड़ा था? और उस अकेलेने ही गरुडजीका कौन-सा अपराध किया था?॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.17.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 249) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/17/1/